उत्तराखंड सरकार ने राज्य में कृषि और उससे संबद्ध क्षेत्रों के सर्वांगीण एवं सतत विकास के लिए देहरादून से ऐतिहासिक 20-वर्षीय ‘उत्तराखंड कृषि रोडमैप’ तैयार करने की महत्वाकांक्षी प्रक्रिया शुरू कर दी है। आगामी वर्ष 2046 तक की दीर्घकालिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाए जा रहे इस व्यापक रोडमैप में राज्य के सभी 13 जिलों की विशिष्ट भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप अलग-अलग रणनीतियां बनाई जाएंगी। पंतनगर स्थित गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डॉ. शिवेंद्र कुमार कश्यप को इस दूरगामी परियोजना का मुख्य समन्वयक नियुक्त किया गया है, जबकि कृषि सचिव डॉ. एस. एन. पांडेय के मार्गदर्शन में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों तथा विभिन्न सरकारी विभागों का एक एकीकृत कार्यबल गठित किया गया है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों से हो रहे पलायन को रोकना, बंजर व परती पड़ी कृषि भूमि को पुनर्जीवित कर आधुनिक जैविक एवं प्राकृतिक खेती के दायरे में लाना, तथा प्रत्येक जिले के लिए वर्ष 2031, 2036, 2041 और 2046 तक के ठोस एवं मापन योग्य लक्ष्य तय करना है। राज्य सरकार ने ‘एक मंडी-एक गांव’ जैसी अभिनव योजनाओं के माध्यम से किसानों को उनके गांवों के निकट ही विपणन और प्रसंस्करण की सुविधाएं उपलब्ध कराने की रणनीति तैयार की है, ताकि बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो और किसानों की आय में गुणात्मक वृद्धि हो सके। देहरादून में आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में कृषि विभाग के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि पर्वतीय जिलों में जलवायु-अनुकूल फसलों, बागवानी, जड़ी-बूटी उत्पादन और सुगंधित पौधों की खेती को बढ़ावा देने के साथ-साथ मैदानी क्षेत्रों में उन्नत प्रौद्योगिकी आधारित कृषि पद्धतियों को एकीकृत किया जाएगा। इस रोडमैप के प्रभावी क्रियान्वयन से न केवल राज्य के कृषि सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) में बड़ी वृद्धि का अनुमान है, बल्कि ग्रामीण युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर ही कृषि-उद्यमिता और स्वरोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
उत्तराखंड में कृषि एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदलने के लिए देहरादून से 20 वर्षीय कृषि रोडमैप की हुई शुरुआत

