उत्तराखंड की राजनीतिक फिजाओं में इन दिनों भारी सरगर्मी देखी जा रही है क्योंकि अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर अंदरूनी गुटबाजी और सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इन्कंबेंसी) की खबरें लगातार तेज हो गई हैं। नई दिल्ली में बैठे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को राज्य इकाई में बढ़ते असंतोष और गुटबाजी को लेकर कई गंभीर शिकायतें मिली हैं, जिसने पार्टी के “मिशन हैट्रिक” के लक्ष्य के सामने एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। इसी सिलसिले में स्थिति का जायजा लेने और राज्य कैडर में पैदा हुए आपसी मतभेदों को सुलझाने के लिए भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन नबीन ने हाल ही में पहाड़ी राज्य का तीन दिवसीय सघन दौरा किया है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी नेतृत्व इस बात को लेकर बेहद चिंतित है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बार-बार की सलाह के बावजूद कई मौजूदा विधायक अपने-अपने क्षेत्रों में जनता और कार्यकर्ताओं से पूरी तरह कटे हुए हैं। इसके साथ ही, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार पर विभिन्न आदिवासी संगठनों द्वारा संविधान की पांचवीं अनुसूची को लागू करने और राज्य के मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष दर्जा देने का भारी दबाव बनाया जा रहा है। स्थानीय सामाजिक संगठनों का आरोप है कि सरकार राज्य के सख्त भू-कानून के प्रावधानों को सही ढंग से लागू करने में पूरी तरह विफल रही है, जिससे बाहरी लोगों को बड़े पैमाने पर जमीन बेचने पर रोक नहीं लग पा रही है। इन तमाम राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियों से निपटने के लिए शीर्ष नेतृत्व अब राज्य में कई नए चेहरों को मैदान में उतारने और कुछ मौजूदा मंत्रियों की सीटों को बदलने की रणनीति पर गंभीरता से विचार कर रहा है ताकि आगामी चुनावों से पहले जनता के बीच बने असंतोष को समय रहते नियंत्रित किया जा सके।
आगामी विधानसभा चुनावों से पहले उत्तराखंड भाजपा में अंदरूनी कलह और एंटी-इन्कंबेंसी की चुनौती बढ़ी

